याद
एक अरसे के बाद जब आई उनकी याद,
समायी जैसे जान एक ज़िन्दगी के बाद,
ज़बान चलने लगी, कदम बोल पड़े, "अब क्या लेने आये हो?"
याद ने अपने माथे से पसीना हटाया,
तेज़ साँसों को धीमी की,
और थकीसी मुस्कान बोली, "पहले पानी तो पिला दो..."
बत्तीसी ने बता दिया, हाथों ने दिखा दिया,
शीशे में रहता नहीं पानी, बहती है तो बस में.
गर मेहमान को न हो ऐतराज़, तो पिला दूं मैं?
अपनी तौबा को उन्हूने कोने में बिठाया,
बेशरम ने अपना हाथ जाम की ओर बढाया
मेज़बान-नवाजी की उन्हूने फिर तो हद्द दिखाई,
थोड़ी और, थोड़ी और की जब रट लगायी
पीते तो हम भी हैं बेहिसाब, जनाब,
पर उस दिन लग रही थी हर शराब, खराब.
जब शीशों से आने लगी आवाजें,
सन्नाटा सा बातों में आने लगा,
जब हो गए खाली प्याले,
अन्दर बाँध सा कुच्छ बन्ने लगा.
डालकर खाली प्यालों पर तरसी हुई नज़र,
दे दिया याद ने खातिरदारी का वास्ता
की "याद को याद मत करना, जाम के साथ,
ख़त्म हो जाएगी जाम, पर याद नहीं."
टूटा दिल तो अब कुछ भी न रहा,
जब टूटते हुए बाँध का जैसे मज़ा ही और था!
नमकीन नदियों से समाने लगे थे प्याले,
जिनपर गिरने लगे थे बादल बरसने वाले.
"जाम को न याद करना हमारे साथ,
याद ख़त्म हो जायेगी पर यह जाम नहीं."
याद बोली,
"येही तोह था वोह पानी, जो हमको चखना है,
लौटकर मोह्तारना को, जिसका स्वाद बताना है"